जबान की तलवार ने सरकार के सीने में किया गंभीर घाव
देश के युवाओं ने हिलाई केंद्र सरकार की नींव
मोदी शाह को चबवा दिए लोहे के चने
काकरोचों की झालमुडी का जबरदस्त स्वाद,चखते चखते बेहोश सरकार
लोक संवाद टुडे। कहावत चरितार्थ है कि जब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है तो उसे अपनी औकात का पता चलता है। वहीं अति आत्मविश्वास और घमंड की अति होती है तो उसका विनाश की पटकथा शुरू हो जाती है। अतिआत्मविश्वास और घमंड तो विद्वान और महाबली रावण का भी विनाश का कारण बना। विनाश काले विपरीत बुद्धि यह कहावत को सिद्ध करवाया है भारतवर्ष की शिक्षित और धैर्यवान युवा शक्ति अर्थात माननीय न्यायालय और सत्ताधारी द्वारा नामित काकरोचो ने।
कहते हैं जबान से निकले शब्दबाण और कमान से निकला बात वापस नहीं आता। जबान की से निकली अंधभक्ति की तलवार/तीर ने जो गांव वर्तमान केन्द्र सरकार को पहुंचाया और जो काम पूरा विपक्ष मिलकर नहीं कर पाया वह तलवार/तीर से घायल देश के युवाओं ने पिछले 12 वर्ष के शासनकाल से चले आ रहे घंमड और अति आत्मविश्वास को मात्र 26 दिन में तारे दिखते हुए और लोहे के चने चबवा कर कर दिखाया।
मैं धन्यवाद करना चाहूंगा माननीय चीफ जस्टिस जी का जिन्होंने सोते हुए शेरों को नींद से जगाने का काम किया। वर्तमान सोशल मीडिया के दौर में सात समुंदर पार भारत के युवा को गहरी गुफा में सोए शेर को ऐसा जगाया कि शेर काकरोच बनकर देश के युवाओं का मार्गदर्शक बन गया। इस मौके पर मुझे शायद सातवीं आठवीं कक्षा की हिंदी पुस्तक के एक निबंध की पंक्तियां याद आई है जो इस प्रकार है - कि भारतीयों को हमेशा एक ऐसे इंजन की जरूरत होती है जो अन्य डिब्बे खींच सके, डिब्बे जुड़ते जाते हैं और मंजिल पर पहुंच जाते हैं।
शायद यही काम करने में दीपके इंजन बनकर युवाओं को जोड़ने में सक्षम हुएं। जिस तरह दीपके ने चीफ जस्टिस के शब्दों को हाथों-हाथ लेकर सोशल मीडिया पर धमाल मचाया वह विश्व में अनोखा और अविश्वसनीय अहिंसक आंदोलन होगा। दीपके ने जिस विदेश में रहकर सोशल मीडिया में आंदोलन की शुरुआत की उसका अंदाजा न चीफ जस्टिस को था,न केन्द्र सरकार को और न केन्द्र सरकार की खुफिया एजेंसियों, संगठनों व कार्यकर्ताओं को। भारतीय युवा शक्ति ने उनके अविभावकों ने, देश-विदेश के कारपोरेट से जुड़े युवाओं और राजनीतिक दलों ने युवाओं को ताकत देने का काम किया वह भी जाति-पाति, धर्म और राजनीतिक दलों से हटकर एकजुटता का परिचय दिया वह सराहनीय और अद्भुत है।
देश की केन्द्र सरकार और विपक्षी दलों को भी एहसास हो चुका है कि युवाओं की उपेक्षा और उत्पीड़न गये जमाने की बात है आज का युवा शिक्षित, धैर्यवान, कर्मयोगी और सहनशील भी है। यह सब देश के युवाओं ने इस आंदोलन में कर दिखाया है और सरकार को अपनी मांगों को मनवाने में कामयाब हुए। युवाओं ने अपनी मांगों में कोई भी राजनीतिक रंग नहीं दिया और न ही किसी राजनीतिक दल को राजनीति का मौका दिया। स्वयं नेतृत्व किया और नेतृत्व को अंजाम दिया।
आलेख - पुष्कर सिंह पवार "पदम"

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