सरकार की वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की सजा भुगत रहे उत्तराखंड के निवासी

  सरकार की वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की सजा भुगत रहे उत्तराखंड के निवासी 



 गढ़वाल मंडल में गुलदार और भालुओं का भयंकर तांडव 
 पहाड़ तो पहाड़ भाबर और तराई में हिंसक जंगली जानवरों के आतंक के साए में उत्तराखंडी जनमानस 

 वनविभाग उत्तराखंड के छोटे कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा जनता के आक्रोश को 
  डीएफओ, एसडीओ और रेंजर आफीस में बैठकर देख रहे तमाशा 

उत्तराखंड वन निदेशालय केन्द्रीय मंत्रियों को सूचना भेजने तक सीमित नहीं है कोई व्यवस्था आमजन को बचाने की, केवल उत्तराखंड के जंगलों को उजाड़ने की योजनाओं के लिए योजना बनाने तक सीमित।
 उत्तराखंड का वन निदेशालय कारपोरेट घरानों की कठपुतली बनकर उत्तराखंड की भौगोलिक डेमोग्राफी को बदलने का कर रहा काम।
 उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन बचाने वाले पर्यावरण प्रेमी, एनजीओ कारपोरेट घरानों और अधिकारियों की चमचागिरी में लिप्त 

कोटद्वार । उत्तराखंड की धरती सदियों से जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण की हितैषी व संरक्षण को समर्पित रही है। उत्तराखंड का चिपको आंदोलन किसी सामाजिक, राजनीतिक और एनजीओ की देन नहीं वरन् आम जनमानस के प्रकृति प्रेम की विरासत है।

परन्तु देखने में आ रहा है कि जब से उत्तराखंड राज्य बना यह परम्परा मिटती जा रही है। कुछ लालची, मौकापरस्त और चापलूस पर्यावरणविद का चोला पहनकर वनविभाग, वन्यजीव संरक्षण निदेशालय और कारपोरेट घरानों के एजेंट की भूमिका में उत्तराखंड की जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण को अपने निजी स्वार्थ के लिए मिटाने पर तुले हैं,जिसका परिणाम उत्तराखंड आज प्राकृतिक आपदाओं, हिंसक जंगली जानवरों के रूप में देख और भुगत रहा है। उत्तराखंड की नदियों बड़े बड़े बांध हमारा पानी तो तीन ही रहे हैं साथ ही बिजली की लाइन बिछाने के लिए भी हमारी प्राकृतिक धरोहर जंगलों और जमीनों को उजाड़ने का काम कर रहे हैं।
 उत्तराखंड निवासियों को अपनी मूलभूत सुविधाओं जिनमें सड़क, बिजली और जल, जंगल, जमीन और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आवश्यक भूमि जो वन क्षेत्र में है जहां वर्षों से उत्तराखंड के लोग निवास करते हैं भूमिधारी अधिकार के लिए सड़कों पर आंदोलनरत हैं परन्तु उन्हें यह अधिकार नहीं मिल रहा वहीं कारपोरेट घरानों को विकास के नाम पर जिसका उत्राखंडियों को कोई लाभ नहीं उनके लिए सड़क, बिजली और रेल परियोजनाओं के नाम पर लाखों पेड़ों की बली, करोड़ों एकड़ भूमि और करोड़ों करोड़ों क्यूबिक पानी देने वाली नदियों की लूट-खसोट कर लाभ पहुंचाने का काम किया जा रहा है। 
 स्थिति आज इतनी भयानक हो गई कि उत्तराखंड के जल, जंगल जमीन उजड़ने से जंगल में रहने वाले हिंसक जंगली जानवर आबादी में अपना आशियाना और भोजन की तलाश में निरीह जनमानस को निशाना बनाने लगे हैं जिनका समाधान उत्तराखंड वन्यजीव संरक्षण और वनविभाग के पास नजर नहीं आता। 
 कुछ समाचार पत्रों की खबरों के माध्यम से उत्तराखंड के आमजन की पीड़ा को वनविभाग,वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और जिम्मेदार निदेशालय की उत्तराखंड के संदर्भ में नीतियों और व्यवहारिक खामियों के चलते भुगत रही निर्दोष जनता की पीड़ा दिखाने का प्रयास लोक संवाद टुडे ने करने का प्रयास किया है। उम्मीद करते हैं उत्तराखंड का वनविभाग व वन्यजीव संरक्षण निदेशालय इस मामले में संज्ञान लेकर सकारात्मक नीतियों और अधिनियम पर कार्य करें।
रिपोर्ट - पुष्कर सिंह पवार "पद्म"


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